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Lest, it is granted!

[ A translation  of verse 28 from Nobel Laureate Rabindranath Tagore’s Geetanjali by Smt. Krishna Shukla]

हठी हैं ज़ंजीरें, पर मेरा हृदय पीडि़त होता है
जब मैं उन्‍हें तोड़ता हूँ
स्वतंत्रता ही मेरी आकांक्षा  है –
पर उसकी उम्मीद मुझे
शर्मिंदा करती है
मैं निश्चिन्त हूँ कि अमूल्‍य सम्पदा स्वामी  आप मेरे मित्रवत हैं
पर मेरे हृदय में इतना साहस नहीं है
कि झाड़ सकूँ
अपने कमरे की उथली रँगीनी।

कफन जो मुझे ढँके है
वह कफन है धूल और मौत का
मैं उससे घृणा करता हूँ
फिर भी लपेटे हूँ प्रेम से।

बहुत कर्ज हैं मेरे
बहुत बड़ी असफलताऍं;
मेरी लज्जा भारी और गोपन।

फिर भी जब मैं अपने हित के वर को आता हूँ,
डर मुझे  कँपा देता है कि कहीं स्वीकृत
हो जाये न मेरी प्रार्थना।

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